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रेडियो श्रोताओं के बीच प्राण वायु की तरह हमेशा रहेगा – रेडियोसखी ममता सिंह

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For those who listen to Vividhbharati every day, her voice is not new to you. Specially if you tune in at 3pm for Sakhi Saheli on weekdays, her voice makes every lady feel at home. She discusses their sorrows, happiness, challenges, difficulties with so much warmth in her heart, it easily shows through her voice. Always full of positive energy, subtle in her conversations, a motivator to everyone around her – Radiosakhi Mamta Singh.
TheSongPedia in conversation with Mamta Singh.
(Some of her favourite songs have been inserted in between the q & a)
Images courtesy – internet

1. संगीत के साथ अपने पहले जुड़ाव की यादों के बारे में बताएं।
बचपन से ही गाने का बड़ा शौक था, कहीं किसी के घर रामायण या कीर्तन होता था तो हम वहां जरूर जाते। सम्पुट के साथ रामायण गाने का आनंद ही अलौकिक था। उसके बाद रेडियो के युववाणी प्रोग्राम में गाने का मौक़ा मिला।गाने की ट्रेनिंग रेडियो से और बाद में शास्त्रीय संगीत सीखना शुरू किया। फिर प्रयाग संगीत समिति से प्रभाकर किया। नवीं क्लास से शास्त्री संगीत सीखना शुरू किया था, ज़रा भी सुर इधर उधर हो जाये तो हमारीं संगीत टीचर बहुत डांटती थीं….कई दिन तक स प स का ही रियाज़ करवाया था….।लेकिन उससे हम सब छात्राओं का गला खुला, सुर में गाना सीखा।

2. आप उद्घोषक के रूप में रेडियो में कैसे आए? आपने इसे अपने करियर के रूप में क्यों चुना?
मुंबई में मैं पत्रकारिता कर रही थी। एक सांध्य दैनिक अखबार में बतौर उप संपादक काम कर रही थी। तभी रोजगार समाचार पत्र में विविध भारती के लिए उद्घोषक पद की वैकेंसी आई। मैंने आवेदन किया। लिखित परीक्षा हुई। ऑडिशन हुआ और फिर इंटरव्यू। चयन हो गया तो स्थायी रूप से जॉब करने लगी। लेकिन इसके पहले अस्थाई उद्घोषक यानी कैज़ुअल अनाउंन्सर के रूप में भी महीने में 6 दिन ड्यूटी किया करती थी। दरअसल कैरियर के रूप में मैंने इसे नहीं चुना था। मैं पत्रकारिता के साथ साथ कॉम्पटीशन्स की तैयारी कर रही थी।हमने उद्घोषक पद के लिए इम्तिहान दिया सिलेक्शन हो गया। फिर जब इस विभाग में नौकरी करने लगी तो पता चला कि यह तो एक तिलिस्मी दुनिया है ,फिर शौक़ और जुनून से रेडियो के काम मे जुट पड़ी।पर पहले कभी रेडियो में आने का सपना नहीं देखा था।

3. आप और आपके पति दोनों ही विविधभारती के प्रस्तुतकर्ता हैं। आप बदलावों को कैसे संतुलित करते हैं, आपको किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है?
ये ठीक वैसे है जैसे अन्य क्षेत्र में पति पत्नी एक साथ काम करते हैं। अपने फायदे नुकसान होते हैं, चुनौतियां होती हैं…। मेरे पति के प्रस्तुतिकरण की शैली अलग है, मेरी अलग…हम लोग कभी एक दूसरे की नकल नहीं करते….। कई बार लोग तुलना करते हैं–एक दूसरे के कार्यक्रम की, तो मैं यही जवाब देती हूँ, हम दोनों की स्टाइल बिल्कुल अलग है….। हाँ कई बार कुछ गानों से जुड़ी बारीकियों के बारे में एक दूसरे से मशवरा करते हैं।

4. आपने राग मारवा नामक पुस्तक भी लिखी है। हमारे साथ इसके बारे में कुछ साझा करें।
राजपाल एंड संस् से प्रकाशित “राग मारवा “11 कहानियों का संग्रह है। जिसमे आम ज़िन्दगी की कहानियाँ हैं। इसमें बूढ़ी कुसुम जिज्जी के atm मशीन की तरह घर मे यूज़ किये जाने की पीड़ा है, अपने गायन के प्रति तड़प है…। फैमिली ट्री में बच्चे का मनोविज्ञान है, वर्किंग जोड़ें के बच्चे जब बेबी सिटिंग में पलते हैं तो क्या होता है, इसकी छटपटाहट है…..रिश्तों की अन्य कहानियां हैं, हर कहानी एक दूसरे से जुदा है, हर कहानी का रंग अलग है। जनरल टिकट में एक लड़की अपने सपनो को परवाज़ देने के लिए घर से बगावत करती है…..।मुश्किल है अपनी कहानियों के बारे में ख़ुद बयान करना। आप ख़ुद पढ़िए और हमे बताइये ।

5. आपने राग मारवा को शीर्षक के रूप में क्यों चुना?
ये कहानी संग्रह की शीर्षक कहानी है। राग मारवा शाम के दूसरे प्रहर में गाया जाने वाला एक उदास राग है। कहानी “राग मारवा” संगीतमय कहानी है जिसमें तबले के कई ताल और रागों का जिक्र है। कहानी की नायिका कुसुम जिज्जी एक गायिका हैं जो स्टेज कार्यक्रमों की प्रस्तुति के दौरान राग मारवा गाती हैं। अपने अकेलेपन में भी वे राग मारवा गाती हैं ,गायन में वे अपने अकेलेपन, ऑस्टियोपोरेसिस बीमारी के दर्द और जीवन की तमाम पीड़ा को उड़ेल देती हैं, भीतर दर्द की नदी है पर परिवार के लोग उनकी पीड़ा नहीं महसूस कर पाते।यह मेरी प्रिय कहानी है। इसलिए मैंने किताब का शीर्षक राग मारवा रखा।

6. आप एक उद्घोषक, लेखक, माँ, पत्नी के रूप में अपने जीवन को कैसे संतुलित करती हैं?
जैसे तमाम महिलाएँ करती हैं।हर स्त्री अपने जीवन में एक साथ कई किरदार निभाती है। कभी मां कभी पत्नी कभी बेटी कभी बहू के रूप में। मैं भी निभा रही हूं। लेकिन मैं इस जिम्मेदारी को शौक से निभा रही हूं जुनून के साथ। मुश्किल तो होता है एक साथ कई काम करना लेकिन अगर आप समय का सामंजस्य सही तरीके से बिठा लें और कौन सा काम कब करना है? यह निर्धारित कर लें तो काम असंभव नहीं होता। उद्घोषक की ड्यूटी पर मैं उद्घोषणा करती हूं दफ़्तर के काम करती हूँ।जब घर में होती हूं तो मां और पत्नी की भूमिका में होती हूं लेकिन लेकिन हां, जो मेरे अकेलेपन का वक्त होता है वो खुद से गुफ़्तगू का होता है, वही मुझसे लिखवाता है, उस म
निजी समय में कहानियां रचती हूं। कहानियां लिखने के लिए कोई तयशुदा वक्त नहीं होता है बस जब थोड़ा सा वक्त मिलता है उसी वक्त को चुरा कर लिखती हूं कहानियां।

7. उद्घोषक के रूप में शुरुआत के दिनों में आपको किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा?
हमने जब विविध भारती जॉइन किया तब बदलाव का वक्त था। हमसे बहुत सारी उम्मीदें थीं कि कुछ नया करें, नए अंदाज में प्रोग्राम पेश करें, कुछ fm चैनल्स शुरू हो रहे थे। ऐसे में उनके अंदाज में बोलने को कहा जाता था। उसी चुनौतीपूर्ण दौर में हमने अपनी एक शैली गढ़ी। और अपने नाम के साथ रेडियो सखी भी जोड़ा जो लोगों ने बहुत पसंद किया। आलम अब यह है कि हमें लोग ममता सिंह की वजह रेडियो सखी के रूप में ज्यादा जानते हैं। शुरुआत में ही कई नए कार्यक्रम शुरू किए गए जिसमें एक कार्यक्रम था “आपके अनुरोध पर” फोन पर रिकॉर्डिंग होती थी, देशभर के श्रोता उसमें फोन करते थे। उस कार्यक्रम को रिकॉर्ड करना फिर उनकी एडिटिंग मिक्सिंग और फिर प्रस्तुत करना….. रोचकता बनाए रखने के लिए बातचीत में हमेशा नयापन जोड़ना पड़ता था। इसी तरह कार्यक्रम था। हेलो फरमाइश यह हम सभी उद्घोषक बारी बारी से किया करते थे। और भी कई कार्यक्रम शुरू हुए जैसे पिटारा कार्यक्रम। इसके अंतर्गत 7 दिन सात रंग होते थे ।
इसके अलावा,नाटक कहानियां छाया गीत… फिल्म की मशहूर हस्तियों से बातचीत पर आधारित कार्यक्रम…ये सब चुनौतीपूर्ण ही लगते थे और इन चुनौतियों को हमने स्वीकार किया ,कड़ी मेहनत की। तपस्या की जिसका फल भी हमें मिला। बड़ी खुशी होती जब हमारीं आवाज़ से लोग स्नेह करते हैं। इससे हमरे संस्थान का गौरव बढ़ता है।ये हमरी खुशनसीबी है। कि हम ऐसे संस्थान (विविध भारती) में काम करते हैं जो देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर में लोकप्रिय है।

8. जहाँ तक संगीत का संबंध है, आपके प्रमुख प्रभावक कौन हैं?
मेलोडियस संगीत पसन्द आता है। ऐसा संगीत जिसे सुन कर सुकून मिले। पर हाँ कभी कभी मौजमस्ती वाला संगीत भी
पसंद करती हूं। कभी-कभी डांस सॉन्ग पार्टी सॉन्ग भी अच्छे लगते हैं।

9.अब आपको अपने करियर में किस प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है?

समस्या तो कोई नहीं होती, हाँ चुनौती हर रोज़, हर पल होती है।

10.आज के RJs के बारे में आपके क्या विचार हैं?
हमे लगता है, अगर रेडियो पर ज़रा सुकून और ठहराव के साथ बोला जाए तो सुनने में अच्छा लगता है। बहुत लाउड बोलने की बजाय अगर सॉफ्ट और मुहब्बत के साथ बोला जाए तो बात दिल तक असर करती है और देर तक गूंजती है आवाज़….।
मेरे खयाल से तेज़ रफ़्तार में ज़ोर ज़ोर से बोलने पर श्रोताओं के जुड़ाव नहीं हो पाता है। वैसे सबकी बोलने की अपनी अपनी शैली होतो है। मेरा मानना है कि सिर्फ यूं ही बोलने के लिए नहीं बोलना चाहिए जब भी बोलें तो कोई जानकारी हो और जानकारी के साथ विचार हो । लोगों को एक विचारधारा हम दे सकें। कुछ ऐसा बोले कि लोगों की कल्पनाशीलता बढ़े, लोग सोचने के लिए मजबूर हो। सिर्फ शब्दों का जाल न बुनें….।

11. क्या आपको लगता है कि इंटरनेट और मोबाइल ने रेडियो की दुनिया को प्रभावित किया है? यदि हाँ, तो कैसे?
पहले गाने सिर्फ रेडियो पर उपलब्ध होते थे। अब इंटरनेट के माध्यम से, यू ट्यूब चैनल के माध्यम से गाने हर जगह उपलब्ध है।हर गाना माउस के एक क्लिक या मोबाइल की एक टच से उपलब्ध है। इसके बावजूद रेडियो अपने कार्यक्रमों के माध्यम से,अपनी अदायगी के माध्यम से, अपनी पहचान बनाए हुए हैं। नाटक कहानियां रूपक वार्ता। यह सब हमें रेडियो पर ही तो सुनने को मिलते हैं। इसलिए रेडियो की अहमियत कम नहीं हुई है और ना ही कम होगी। रेडियो श्रोताओं के बीच प्राण वायु की तरह हमेशा रहेगा।

12. विविध भारती के कार्यक्रम जिन्हें आप प्रस्तुत कर रहीं हैं, उनके बारे में कुछ बताएं।
एक बेहद लोकप्रिय कार्यक्रम है सखी सहेली। जिससे मैं और एक हमारी साथी कंपेयर प्रस्तुत करते हैं। महिलाओं का महिलाओं द्वारा महिलाओं के लिए सरलता और सहजता के साथ प्रस्तुत किए जाने वाला बेहद मकबूल कार्यक्रम है। इसमें देश भर की श्रोता बहने चिट्टियां भेजती हैं उन चिट्ठियो से जुड़ी हुई बातें करते हैं इसके साथ ही तमाम देश दुनिया की समसामयिक जानकारियां भी उन तक पहुंचाते हैं। साथ में सखियों के पसंद के गाने भी सुनवाते हैं। इस कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण चिट्ठियां होती है और चिट्टियां बड़ी तादाद में होती हैं,यूँ कि अंबार होते हैं हमारे पास। इस कार्यक्रम से जुड़ी हुई एक बात साझा करना चाहती हूं। जाने-माने शायर और गीतकार शहरयार साहब विविध भारती के स्टूडियो में रिकॉर्डिंग के लिए आए तो जब हमारा परिचय हुआ तो उन्होंने कहा कि तुम वह “सखी सहेली” वाली ममता हो यह बात मुझे आज तक याद है। विविध भारती से प्रसारित होने वाला एक बेहद मकबूल कार्यक्रम है छाया गीत जिसे हम सभी उद्घोषक बारी-बारी से एक-एक दिन प्रस्तुत करते हैं। इसमें फिल्मी गाने से जुड़ी हुई कॉम्पेरिंग होती है जिसे लोग बहुत पसंद करते हैं।इसके अलावा नाट्य तरंग हवामहल जयमाला इनसे मिलिए हेलो फरमाइश वगैरह कई कार्यक्रम है जो श्रोताओं के पसंदीदा कार्यक्रम हैं।

13. आप उद्घोषक के रूप में अपनी आवाज का क्या खास ख्याल रखते हैं?
दरअसल आवाज़ का कुछ खास ख़याल मैं नहीं रखती। सब कुछ खाती हूँ…. चाट चटपटे अचार चटनी सब कुछ खाती हूं। हां बदलते मौसम में या बहुत ठंड के मौसम में आइसक्रीम अवॉइड करना पड़ता है। उससे गला खराब होता है। हाँ जब कोई विशेष रेकॉर्डिंग हो तो खाने में थोड़ा परहेज़ कर लेते हैं।

14. रेडियो और पत्रों के माध्यम से लोगों के साथ बातचीत करना कैसा लगता है। जब आप एक कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं तो क्या आप अपनी लाइनें खुद लिखतिं हैं?
पत्रों के माध्यम से कार्यक्रम पेश करना सुखद अनुभव होता है। अब तो sms और फ़ोन के ज़रिए भी कार्यक्रम प्रस्तुत किये जाते हैं । कार्यक्रम के दौरान फोन पर बात करना बहुत अच्छा लगता है। देशभर से जब श्रोता हम से फोन पर बातें करते हैं तो उस प्रदेश की संस्कृति वहां की बोली भाषा के बारे में अवगत होते हैं उन श्रोताओं के बारे में जानकारी हमें मिलती है तो जाहिर है हमें बड़ा दिलचस्प लगता है उनकी बातें सुनना।
अपने हर कार्यक्रम की स्क्रिप्ट हम खुद दिखते हैं। जो कुछ बोलते हैं वह हम खुद लिखते हैं। हालांकि सब कुछ कागज पर लिखा हुआ नहीं होता है। बहुत कुछ बिना लिखे भी स्पोंटेनियस बोलते हैं।

15. कुछ दिलचस्प कहानियां / दिलचस्प किस्से या कलाकारों के साथ मजाकिया पल जो आप संक्षेप में साझा कर सकते हैं?
अभिनेता नाना पाटेकर से जुड़ी हुई एक यादगार घटना है। उनसे इंटरव्यू में ले रही थी, इंटरव्यू के एक लंबे हिस्से की रिकॉर्डिंग हो चुकी थी , बीच-बीच में उनकी पसंद के गाने भी हम पूछ रहे थे। जब मैंने उनकी पसंद का अगला गाना पूछा तो अचानक भी बोल पड़े अब आप अपनी पसंद का गाना सुनाइए और उसके बाद उन्होंने मेरा इंटरव्यू लेना शुरू कर दिया। उन्होंने कहा इतनी देर से आप पूछे जा रही थी अब मैं पूछूंगा। और बस। मामला उलट गया। यह बड़ा ही मजेदार इंटरव्यू बन गया है। जिसमें आधे इंटरव्यू में बातें मैं कर रही हूं और बाकी आधे इंटरव्यू में सवाल नाना पाटेकर पूछ रहे हैं।

16. कलाकारों, संगीत के जानकारों के साथ अपने जुड़ाव के बारे में बताएं।
जिन कलाकारों के गाने रोज़ दिन भर सुनते हैं उनसे अनुराग होना स्वाभाविक है। पहले अपनी पसंद के गाने गीतकार ,संग्गीतकर के नाम एक नोटबुक में लिखते थे अब फोन के नोट पेड में रखते हैं…..। जिन कलाकारों के इंटरव्यू किये हैं उनके गाने और शिद्दत से गहराई से सुनते हैं। जैसे लता मंगेशकर। से कई बार मैंने फोन पर बातचीत की है। वह सारी रिकॉर्डिंग मेरे लिए अनमोल धरोहर की तरह है। इसी तरह महेंद्र कपूर से एक लंबी बातचीत रिकॉर्ड करने का मौका मिला था। खय्याम साहब से बातचीत करने का मौका मिला। ऐसे अनेक कालजई कलाकार है जिन से बात करना। बड़े सौभाग्य की बात है। हर कालजयी कलाकार के गानों से लगाव है, अपने हर पसन्दीदा गाने से प्यार है ।

17. आपको रोज काम करते रहने के लिए क्या प्रेरित करता है?
अपने भीतर की ऊर्जा काम के प्रति मेरा जुनून औरअनुराग। संगीत दे लगाव….। कई बार काम के लिए मिले पुरस्कार और लोगों की निश्चल भाव से की गई सही प्रशंसा भी ज्यादा काम के लिए प्रेरित करती है।

18. एक कलाकार जिससे आप रेडियो पर बात करना पसंद करेंगे?
अमिताभ बच्चन …..

19. लेखन, रेडियो और संगीत ने आपके जीवन को किस तरह समृद्ध किया है?
रेडियो हमारा जॉब और जुनून है, रेडियो सही मायने में हर पल का साथी है।
लेखन जीवन को सार्थकता प्रदान करता है, समाज से सरोकार रखने के लिए बाध्य करता है। रोजमर्रा की ज़िंदगी मे, हर दिशा और दशा को बारीकी से देखने का नज़रिया देता है। विचारों से सिद्धांतों से समृद्ध करता है लेखन।
संगीत जीवन का एक हिस्सा है। संगीत और रेडियो मेरे लिये दो बहनों की तरह है जिसके दामन में पनाह पा कर शांति मिलती है। जब हम थके या परेशान होते हैं तो अपनी पसंद के गाने या ग़ज़लें सुनना बेहद अच्छा लगता है।

20. कोई संदेश जो आप संगीत प्रेमियों और हमारे पाठकों को देना चाहते हैं, विशेष रूप से विविधभारती प्रेमी और महिलाओं के लिए।
कई साहित्यकारों से यह कहते हुए सुना है कि यह स्त्री-काल है स्त्रियां खूब लिख रही हैं। मेरा यह कहना है कि स्त्रियां सिर्फ लिख ही नहीं रही है बल्कि हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं ….तो विविध भारती प्रेमी महिलाओं से यही कहना चाहती हूं कि वह अपने हुनर को पहचाने अपनी प्रतिभा के मुताबिक मंजिल पाने के लिए आगे कदम बढ़ाए मंजिल जरूर मिलेगी। विपरीत परिस्थितियों में भी हौसला नहीं हारें।साक्षरता बहुत जरूरी है पढ़े और आगे बढ़े। एक बात और..समाज की कुरीतियों जैसे बेटी बेटे के बीच भेद को मिटायें, स्त्रियां खुद स्त्रियों का सम्मान दें…..।
पाठकों से ये कहना है कि अच्छा साहित्य पढ़ें,और सराहें भी। आने वाली पीढ़ी को भी पढ़ने और किताबों से जोड़ें…..।
संगीत प्रेमियों के लिए ये बात कि ज़िन्दगी को सुरीला बनाने के लिए बेहतर और सुकूनदेय संगीत सुनें।शोर भरे संगीत में सुर तलाशें लें….। भारतीय संगीत के समृद्ध ख़ज़ाने की विरासत आने वाली पीढ़ी को भी दिखाएं, सुनाएं।

Avid music lover and Dev Anand fan

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